अंग्रेजी माध्यम

Published by Balraj Arpit on

ये समाज हमें पहले कहती है के अंग्रेजी सीखो और बाद में संस्कृति के नाम पे हमारी पैर भी खींचती है। आज मै इसी के विषय में अपना विचार व्यक्त करूंगा।

सेन्सस कहता है के भारत में ३० भाषा है जो लाखों के द्वारा बोली जाती हैं और १२२ भाषा १०००० से ज्यादा लोगो के द्वारा। संविधान २२ भाषा को मान्यता दी है। ये सब मेरे बात बताने का कुछ वजह है। आइये, एक और बात बताना हूँ, अमेरिका में अमेरिकन अंग्रेजी सबसे ज्यादा बोली जाती है वैसे होने को बहुत सारे भाषा हैं लेकिन हर एक इंसान को अमेरिकन अंग्रेजी आती है।

 मै बिहार के एक छोटे से गाँव का हूँ और जब मैं छोटा था तब हमें कोई ढंग से हिंदी भी बोलना नही सिखाया। लेकिन मेरी माँ काफी कोशिश करती थी के मै अच्छे से हिंदी बोलू। हमारे गाँव में तब बिजली बहुत कम रहती थी इसलिए हम लैंटर्न पे पढ़ते थे। अगर आप सोच रहे है के लालू यादव का चुनाव चिन्ह शायद इसी वजह से है तो आप बिल्कुल सही समझ रहे हैं। बिहार के ज्यादातर घरो में लैंटर्न ही जलता था।

पापा ने डॉक्टरेट किया था और अपना क्लिनिक चलाते थे, लेकिन कुछ वजह से उन्हें दुबई जाना पड़ा। मुझे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में दाखिला दिला दिया गया. बचपन से मै संत जोसेफ स्कूल में पढ़ा लेकिन मेरी पढ़ने की भूख नही मिटी तो मै सहर चला गया आठवी क्लास में. मेरे चाचा मेरा दाखिला ऐसे स्कूल में करा दिया जो सहर से दस किलोमीटर दूर एक खेतो के बीच स्कूल था। दसवी तक मैंने वही पढ़ा फिर मै पटना के संत डोमिनिक सविओस हाई स्कूल मै दाखिला ले लिया लेकिन इस बार मैंने दाखिला खुद से लिया. इसके बाद मैं बस पढ़ते गया ओर सीखते गया।

आज से दस साल पहले कुछ सपनो को लेकर बाहर गया और उस दस साल में मैं अंग्रेजी माध्यम पे निर्भर हो गया क्यूंकि मै जहा भी गया, सिर्फ अंग्रेजी में ही पढ़ाई होती थी। इन दस सालो में मैंने राष्टीय और अंतराष्ट्रीय कांफ्रेंस में हिस्सा लिया। क्यूंकि मै एक युवा संस्था भी चलाता था और अब भी चलाता हूँ। मैं युवाओ के बात-विचार रखा जिसे देश-विदेश के कई बड़े बड़े लोग ने सराहना दिया और मुझे समर्थन दिया।

लेकिन एक बात मुझे पता था के जब मै घर वापस आऊंगा तब सबको समझाने में बहुत परेशानी होगी क्यूंकि जो मैंने किया और अभी भी जो मैं कर रहा हूँ उसके बारे में बहुतो को नही पता।

हमारे समाज और इस देश में अंग्रेजी युवाओ को बहूत प्रभावित करती है। जैसे, अगर मैं हिंदी में बात करू तो ये कहेंगे के मुझे अंग्रेजी नहीं आती और अंग्रेजी में बात करू तो ये अंग्रेज बनता है, देख देख के सिखा है, कॉल सेंटर में काम किया है, और पता नही नही कितनी बाते होती है. और ये गाँव के युवाओ के साथ ज्यादा होता है।

एक और उदहारण देना चाहता हूँ, जयपुर के जे के लक्ष्मीपत यूनिवर्सिटी में सबको पता था के मैं बिहारी हूँ। लेकिन ये नही पता था के मुझे अंग्रेजी अच्छे से आती हैं। उनका मानना हैं कि बिहारी को बस गणित अच्छे से आती हैं और वे बस देख देख के कुछ भी करते और सीखते हैं। पर मुझे कोई परवाह नहीं थी कौन क्या सोचता हैं। मुझे बहुत बाद में पता चला के मेरे बारे में सब सोचते हैं क्यूंकि मैं एकलौता लड़का था जो हर एक कार्यकर्म में भाग लेता था जो कंप्यूटर साइंस और समाज सेवा के विषय में हो। जब मैं के बाद एक कामयाबी हासिल करते गया तब मेरे से जब सवाल या बात करता था कोई तो मुझे पता चल जाता था ये जानना चाहता हैं के मैं कैसे इतना कुछ जानता हूँ। यहाँ तक के जब यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड में मेरा चयन हुआ सम्मर कोर्स के लिए मुझे सोनल जैन जो कंप्यूटर साइंस की हेड थी, उन्होंने ने कहा के बलराज वहा की अंग्रेजी माध्यम कठिन हैं। ये सुनने के बाद मैं मन ही मन हँस पड़ा। मैं कुछ दिनों के बाद सोनल जैन के पास गया और तीन घंटो तक उन्हें मैं अपने बारे में और काम के बारे में उन्हें समझाया। और उनको ये भी बताया के मैं जान-बुझकर अंग्रेजी अच्छे से नहीं बोलता क्यूंकि मुझे जीवन में बहुत कुछ सीखना था।

आज ये वही गाँव का बच्चा, जो लैंटर्न पे पढ़ता था वो आज जीवन के ऐसे मुकाम पे पहुच गया है जो देश-विदेश युवाओ के बीच जागरूकता फैलाता है और अपनी सॉफ्टवेर कंपनी के द्वारा देश के स्कूल, व्यवसाय और लोगो को तकनीक से जोड़कर भारत को डिजिटल बनाने में मदद कर रहा हैं।

हमें भारत में भाषा के मामले में एकता की जरुरत हैं ताकी ये पुरा देश एक दुसरे को समझ सके और भारत को और भी ताकतवर बनाने में मदद करेगी। ऐसे भारत के हर राज्य में कोइ ना कोई एक भाषा बोली तो जाती है, फिर वहा के बच्चो को भी सिखाया जाता हैं के अंग्रेजी माध्यम से पढ़ो लेकिन बाद में वहा भी बच्चा अंग्रेजी ओर अपनी मात्र भूमि के भाषा के बीच पिश के रह जाता हैं। और पैसो के खातिर गलत राह पकड़ लेता हैं।

हमें गुजारिश हैं भारत के माता-पिता और इस समाज से, के युवाओ दबाव ना डाले। उन्हें वही सिखने दे जो वो सीखना चाहते हैं। आप कितना भी कशिश कर लें आम के बीज को कभी भी सेव बनने की इच्छा पूरी नहीं होगी। इसलिए आप बस बीज में अच्छे से पानी डाले, और देखिये के आपका बच्चा कैसे एक विशालकाय पेड़ बन के उभरेगा और वही फल देगा। लेकिन आपकी गलत उम्मीद और कठोरता उसे सूखा लड़की बना देगी। और हाँ, समय लगता हैं, इसलिए अपने बच्चे को भरपूर समय दे सिखने के लिए और उससे अपने जीवन की अनुभव बताए ताकि जीवन में उसे बार-बार दर दर की ठोकर खा कर सीखना ना पड़े।

“आज मैं ना हिंदी में बहुत अच्छा हूँ और ना अंग्रेजी में, लेकिन कंप्यूटर साइंस में मैं बहुत अच्छा हूँ।” – बलराज अर्पित

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