समाज, सोच और मेरी उपलब्धि

Published by Balraj Arpit on

मुझे हिंदी अच्छे से नही आती, इसलिए एक तकनीक का मदद ले रहा हू, शायद किसी समय में किसी प्रोग्रामर को जरुरत दिखी होगी लेकिन हाँ मुझे इस तकनीक की जरूरत है ताकि मै अपने भावनाओ को ब्यक्त कर सकूँ

देवदास की एक बहुत मसहुर डायलॉग है, “बाबूजी ने कहा गाँव छोड़ दो, सब ने कहा पारो को छोड़ दो, पारो ने कहा शराब छोड़ दो, आज तुमने कह दिया कि ये हवेली छोड़ दो, एक दिन आएगा जब वो कहेंगे कि दुनिया छोड़ दो” ये डायलॉग बोलना, समझना और समझाना काफी आसान है क्यूकि हर किसी के जिंदगी में ऐसा है की हम बड़ो की बात मानते है या जिससे प्यार करते है पर मेरी जिंदगी कुछ अलग ही है माँ २००३ में चल बसी, पापा दुबई रहते थे और जब वो भारत में रहने के बारे में सोचे तो बीमारी उन्हें निगल गयी। पापा ने मुझे बिल्कुल अलग ही तरीका से परवरिश दिया है। वो खुद डॉक्टर थे लेकिन मुझे इंजीनियरिंग करने से उनको कोई आप्पति नही थी। और मेरे लाख कोशिशो के बावजूद भी २०१४ में उन्होंने टी.एम्.एच. अस्पताल में दम तोड़ दिया

मेरी इक्षा थी की मै आगे पढू ओर दुनिया में परिवर्तन लाऊ मैंने फिर से कॉलेज ज्वाइन कर लिया दिन-रात दिमाग में बस एक ही बात था, बस रुकना नही है, थकना नही है, हारना नही है और कैसे २०१५ ओर २०१६ आया के पता ही नही चला। और इस बीच मैंने बहुत सारी उपलब्धियाँ हासिल कर लिया था

२०१५ तक मैंने २ रिसर्च पब्लिश कर चुका था और जिस तरह लोग प्यार में अँधा हो जाते है, मैं विज्ञानं के लिए हो गया था नीचे देखे, मेरे कुछ रिसर्च को जो इसरो और इंडो-जापान कांफ्रेंस में छपे और वैज्ञानिको ने सराहना दिया पर मुझे कहा पता था के मै जब ये बात बताऊंगा तब कोई विश्वास नही करेगा जिसके वजह से मै ये लिख रहा हूँ

लेकिन अब भी, दिन-रात दिमाग में बस एक ही बात है, बस रुकना नही है, थकना नही ही है, हारना नही है क्यूंकि मैंने ठान ली है के मुझे बदलाव लाना है

और हाँ, देश दुनिया हर जगह युवा इसी वजह से पीछे है क्यूंकि ज्यादातर लोगो को बाते समझ में तो नही आती लेकिन आत्म-सम्मान के खातिर युवा को गलत साबित कर के उन्हें कुवे में धकेल देते है लेकिन कुच्छ मेरे जैसे है कि बार-बार उठने में विश्वास रखते है

“The greatest glory is not never falling, but in rising every time we fall.” – Confucius

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